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छलकते आँसू Save Priyanshu

आदरणीय सभी को मेरा सादर प्रणाम..! आज जो कहने जा रहा हु जरा सोचियेगा...! कभी कभी जिंदगी न जाने क्यों भार लगने लगती है,  अब सोचता हूं कि ओर क्या कर सकता हु, जो अपने बेटे को बचा सकू...?
उसे आगे का जीवन दे सकू...? मेरी जगह आप कभी अपने आप को रखकर सोचिये........
जब आप अपने घर जाते है, और आपका मासूम सा बेटा आपकी गोद मे आता है, प्यार करता है, जिद करता है, और कहता है कि मैं बड़ा होकर ऐसा बनूंगा ये करूँगा वो बहुत से सवाल करने लगता है....!
और आप बस मुस्कुराते हुए उसे लाड़ करते है..!और प्यार से उसकी बातें सुनते ओर जवाब देते है।
फिर अचानक आपको याद आये.....
की आपका यही बेटा आपके साथ कुछ समय तक ही है... और वह ज्यादा समय तक रहेगा भी नही...!
तब आप इतना मजबूर फील करने लगते हो जैसे कि चाहकर भी कुछ न कर पाना, जैसे बेटा अनेको दिन से भूखा हो  खाना नसीब नही हो रहा और जहाँ मिला वहाँ कीमत इतनी की अपने आप को बेचकर भी बेटे का पेट न भर पायु तब इस फिलिंग को फील करईयेगा। दिन भर सोचता रहता हूं रास्ता ढूंढता रहता हूं,
ओर रात कब सुबह में बदल जाती है पता ही नही चलता। फिर सुबह से निकल जाता हूं एक तलास में ओर जिंदगी की उम्मीद म…